दोस्तों आजका दिन सुबह ही एक बुरी खबर लेके आया, मेरी नींद सुबह एक फ़ोन की घंटी से खुली, ये फ़ोन था सीनियर पत्रकार मनजीत मान जी का श्री मान ने बताया कि कुछ दिनों से तुम जिस घायल बच्चे से जुड़ी स्टोरी लिख रहे थे उसकी आज सुबह मोत जालंधर के सिविल हॉस्पिटल में हो गई है लिहाजा श्री मान ने कहा कि जल्द ही जालंधर पहुंच रहे है तो मुझे और अन्य पत्रकारों को भी सिविल हॉस्पिटल आने को कहा जब हम सब हॉस्पिटल पहुंचे तो मृतक कडके की माता जनक कौर अकेली बच्चे की लाश के सामने खड़ी रो रही थी कोई सहारा देने वाला नहीं था जब हम सब हॉस्पिटल पहुंचे तो मृतक की माता जनक कौर अकेली बच्चे की लाश के सामने खड़ी रो रही थी कोई सहारा देने वाला नहीं था, श्री मान से जब देखा न गया तो उन्होंने बृद्ध औरत से हाथ जोड़के दुःख में शामिल होने की हामी भरी
उसी दौरान हमें पता चला की घायल बलदेब को सर में चोट लगी थी जिसका ढंग से इलाज करने के लिए सिविल हॉस्पिटल में कोई नेउरो का सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर ही नहीं है अब आप खुद सोचिये कि इस बच्चे की माता के पास पैसे नहीं थे कि आगे का इलाज प्राइवेट हॉस्पिटल में करवा पाती जिस वजह से ही 2 प्राइवेट हॉस्पिटल अपना हाथ पहले ही खींच चुके थे और सरकारी हॉस्पिटल का ये हाल अब तो भगवान ही मालिक है हमारे सिस्टम का, पुलिस भी आखिर अपने खाने पूरे करने आ ही गई, मृतक लड़के की माता जनक कौर अंत तक पुलिस को कहती रही की ये एक्सीडेंट का नहीं कतल का मामला है पर पुलिस तो अंतर यामि है वो गरीब का ब्यान क्या कभी ढंग से लिखती है जो आज लिखती, अंत में सब अपने रास्ते चले गए मैं जब वापिस आने लगा तो देखा कि एक बार फिर वो गम में डूबी माँ अकेले खड़ी रो रही थी उसके मुँह से मैंने इतना सुना अब कौन मेरा सहारा होगा अब कौन मुझे 2 वक्त की रोटी खिलाएगा अब मैं कहा जाऊ, बस दोस्तों अंत में तो सब कुछ शून्य सा ही हो गया था